पिछले कुछ सालों में भारतीय शराब उद्योग ने तेजी से विस्तार का दौर देखा है। एक ओर उत्पादन
क्षमता बढ़कर २००० करोड़ लीटर हो गई है, तो दूसरी ओर अधिग्रहण और निवेश के बड़े सौदे इस सेक्टर
को नई दिशा दे रहे हैं। घरेलू कंपनियों के साथ-साथ बहुराष्ट्रीय समूह भी भारतीय शराब बाजार में
हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए सक्रिय हैं। परिणामस्वरूप तकनीक उन्नयन, वितरण नेटवर्क और ब्राण्डों के
पोर्टफोलियो में बदलाव से इस उद्योग का ढांचा बदला है। अधिग्रहण एवं निवेश की तेज रप्तार के पीछे कई
आर्थिक कारक हैं। सबसे बड़ी वजह है, भारत का विशाल उपभोक्ता आधार और यहां की बदलती जीवन
शैली। प्रीमियम और क्राफ्ट श्रेणियों में बढ़ती खपत ने निवेशकों को नये अवसर का लाभ उठाने के लिए
प्रेरित किया है। राज्य सरकारों द्वारा कड़े मापदण्डों की जगह आबकारी नीतियों में लचीलापन, लाइसेंसिंग
सुधार और उत्पादन अनुकूल माहौल ने पूंजी निवेश को आकर्षित किया है।
शराब कंपनियां छोटे ही नहीं बड़े ब्राण्डों को भी अधिग्रहित कर रही हैं। टीआई ने इंटरनेशनल ब्राण्ड
इंपीरियल ब्लू को अधिग्रहित कर अपने पोर्टफोलियो का विस्तार किया है। अशोका डिस्टिलरी और
सीएमजे ब्रुअरी में निवेशक केवल सम्बन्धित उद्योग से ही नहीं हैं, बल्कि बाणगंगा पेपर जैसी दूसरे सेक्टर
की कंपनियां भी निवेश कर रही हैं। एस्प्री स्पिरिट्स जैसी छोटी और मझोली कंपनियां भी अब आईपीओ
लाकर आम लोगों से भी निवेश करा रही हैं।
उत्तर प्रदेश में एथेनॉल अर्थात आबकारी नीति से रोजगार सृजन के नये आयाम खुले हैं। राज्य
सरकार को भी इस सेक्टर से अब बेहतर राजस्व प्राप्त हो रहा है। प्रदेश में १०० से अधिक डिस्टिलरी
स्थापित हो चुकी है। उत्तर प्रदेश आबकारी अपनी नीतियों को न केवल पारदर्शी बनाये हुए है, बल्कि उसका
व्यावहारिक लाभ उद्यमियों को प्राप्त हो रहा है। नये निवेश से प्रदेश में मदिरा की गुणवत्ता में वृद्धि के साथ
स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से उपभोक्ता को भी लाभ हो रहा है। वाइन इंडस्ट्री प्रदेश को राजस्व का मात्र 0.009
प्रतिशत ही योगदान करता है। वाइन इंडस्ट्री एक्साइज ड्यूटी कम करवाना चाहता है।
महाराष्ट्र में वाइन इंडस्ट्री के लिए 60 प्रतिशत तक अंगूर के उत्पादन कम होने से मुश्किल हो सकती
है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2016 में हाइवे पर स्थित मदिरा दुकानों को हटाने के आदेश दिये गये थे। समय के
साथ इस आदेश पर धूल की परतें पड़ रही थी, लेकिन एक बार फिर से राज्य हाइवे से दुकानें हटायेंगी
जिसमें सबसे अधिक राजस्थान से ११०२ दुकानें हटेंगी। भारत के कई राज्यों में बीयर की मांग बढ़ रही है।
बीयर उपभोक्ता बोतल की जगह वैâन में बीयर पीना अधिक पसंद कर रहे हैं। भारतीय सिंगल माल्ट
व्हिस्की दुनिया भर में अपने परचम फहरा रहे हैं। नये साल पर मदिरा उपभोक्ताओं को उपहारों से आकर्षित
करने में शराब कंपनिया लगी हुई हैं। जब भी कॉकटेल की बात होती है तो मार्गरीटा कॉकटेल और टकीला
जरूर याद आता है। हालांकि अब इधर रूस पिछले एक साल में भारतीय उपभोक्ताओं में अपनी वोडका से
पकड़ मजबूत बना रही है।








