कर्नाटक सरकार ने आबकारी व्यवस्था में कुछ महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधारों की घोषणा की है। इनमें Alcohol-in-Beverage (AIB) आधारित कर प्रणाली लागू करना, सरकार द्वारा तय किए जाने वाले दामों को हटाना (डीरिगुलेशन) और मूल्य श्रेणियों (प्राइस स्लैब) को सरल बनाना शामिल है।
इन सुधारों का उद्देश्य राज्य की शराब नियामक व्यवस्था को आधुनिक बनाना, आर्थिक लाभ और सामाजिक प्रभावों के बीच संतुलन बनाना, पारदर्शिता बढ़ाना और उद्योग के लिए व्यापार करना आसान बनाना है।
प्रमुख सुधार बिंदु
1. अल्कोहल की मात्रा के आधार पर कर (AIB)
अब आबकारी कर को पेय पदार्थ में मौजूद वास्तविक अल्कोहल की मात्रा से जोड़ा जाएगा। यह प्रणाली वैश्विक सिद्धांतों के अनुरूप है, जिसमें कर “जोखिम/प्रति लीटर अल्कोहल” के आधार पर लगाया जाता है।
2. कीमत निर्धारण में सरकारी नियंत्रण में ढील
सरकार खुदरा कीमतें तय करने से पीछे हटेगी। इससे कंपनियों को बाजार की मांग और प्रतिस्पर्धा के आधार पर अपने उत्पादों की कीमत तय करने की स्वतंत्रता मिलेगी और अधिक मुक्त बाजार वातावरण बनेगा।
3. IMFL के लिए मूल्य श्रेणियों का सरलीकरण
इंडियन मेड फॉरेन लिकर (IMFL) की कीमत श्रेणियों को 16 से घटाकर 8 कर दिया जाएगा, जिससे कर संरचना सरल होगी और उत्पादों के वर्गीकरण की जटिलता कम होगी।
4. चरणबद्ध लागू करना
नई अल्कोहल-आधारित कर प्रणाली को अगले 3–4 वर्षों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा ताकि बाजार में स्थिरता बनी रहे।
उद्योग पर संभावित प्रभाव
- AIB मॉडल अधिक वैज्ञानिक और न्यायसंगत कर व्यवस्था को बढ़ावा देता है, क्योंकि कम अल्कोहल वाले पेय पर तुलनात्मक रूप से कम कर लगेगा।
- इससे कम अल्कोहल वाले पेय जैसे बीयर, रेडी-टू-ड्रिंक और लो-अल्कोहल ड्रिंक्स के विकास को प्रोत्साहन मिल सकता है।
- कीमतों के डीरिगुलेशन से नवाचार, प्रीमियम उत्पादों का विकास और बाजार आधारित प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना है, जिससे राज्य में निवेश भी आकर्षित हो सकता है।
- सरल प्राइस स्लैब से प्रशासनिक प्रक्रिया आसान होगी, नए उत्पाद जल्दी लॉन्च हो सकेंगे और उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिलेंगे।
नीति से जुड़े महत्वपूर्ण विचार
- AIB आधारित कर व्यवस्था को संतुलित तरीके से लागू किया जाए ताकि राजस्व स्थिरता और उद्योग की वृद्धि दोनों सुरक्षित रहें।
- कर संरचना में बीयर को मध्यम अल्कोहल वाले पेय के रूप में मान्यता दी जाए।
- कर गणना में पारदर्शिता और पूर्वानुमेयता बनाए रखी जाए ताकि दीर्घकालिक निवेश को बढ़ावा मिल सके।
- बदलाव की प्रक्रिया के दौरान उद्योग से जुड़े हितधारकों से नियमित परामर्श किया जाए।
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Consulting Editor – Aabkari Times